<?xml version='1.0' encoding='UTF-8'?><?xml-stylesheet href="http://www.blogger.com/styles/atom.css" type="text/css"?><feed xmlns='http://www.w3.org/2005/Atom' xmlns:openSearch='http://a9.com/-/spec/opensearchrss/1.0/' xmlns:georss='http://www.georss.org/georss' xmlns:gd='http://schemas.google.com/g/2005' xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'><id>tag:blogger.com,1999:blog-4600603968664327804</id><updated>2012-02-17T00:37:40.416+05:30</updated><category term='इंटरव्यू'/><category term='अपराधबोध'/><category term='जिंदगी'/><category term='मोनिका बेदी'/><category term='सआदत हसन मंटो'/><category term='मुंबई में हमला'/><category term='देश पर हमला'/><category term='घर'/><category term='लेखक'/><category term='याद'/><category term='प्रेम'/><category term='कॉरल'/><title type='text'>Summerhill</title><subtitle type='html'>दूर वो एक जगह है...जो मेरे दिलोदिमाग पर छाई हुई है...वो मेरे अस्तित्व का एक हिस्सा...एक कहानी है जो अभी कही नहीं गई...वो समरहिल है...</subtitle><link rel='http://schemas.google.com/g/2005#feed' type='application/atom+xml' href='http://summerhillss.blogspot.com/feeds/posts/default'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4600603968664327804/posts/default?max-results=100'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://summerhillss.blogspot.com/'/><link rel='hub' href='http://pubsubhubbub.appspot.com/'/><author><name>मनीषा भल्ला</name><uri>http://www.blogger.com/profile/08641339911733741450</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/_XL5MGzuI3Pw/SNVJx1535_I/AAAAAAAAAFM/auzHNlwYHi0/S220/m-2%5B1%5D.jpg'/></author><generator version='7.00' uri='http://www.blogger.com'>Blogger</generator><openSearch:totalResults>11</openSearch:totalResults><openSearch:startIndex>1</openSearch:startIndex><openSearch:itemsPerPage>100</openSearch:itemsPerPage><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-4600603968664327804.post-1268512173214761522</id><published>2011-11-09T20:23:00.000+05:30</published><updated>2011-11-09T20:27:37.677+05:30</updated><title type='text'>इस कोठे पर भीड़ है पर रौनक नहीं....</title><content type='html'>&lt;b&gt;इस कोठे पर भीड़ है पर रौनक नहीं....&lt;/b&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/--lmz5hSwC04/TrqUu0jcB1I/AAAAAAAAAIo/TtSD0DFZ7a0/s1600/in04b293.jpg" imageanchor="1" style="margin-left:1em; margin-right:1em"&gt;&lt;img border="0" height="265" width="400" src="http://4.bp.blogspot.com/--lmz5hSwC04/TrqUu0jcB1I/AAAAAAAAAIo/TtSD0DFZ7a0/s400/in04b293.jpg" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;आज तक तवायफों के कोठे फिल्मों में ही देखे हैं। .रौनक की गोद में बसे कोठे और हुस्न..जवानी..जेवर और चिरागों की रोशनी में नहाई उनकी बैठकें। दिल्ली भी उस कोठे की तरह लगती है। दे तो बहुत कुछ (पैसा) रही है लेकिन यह हमेशा के लिए अपनी नहीं हो सकती। चंडीगढ़ या शिमला (होमटाउन) लौटने का मन तो करता है लेकिन लौट नहीं पा रही । दिल्हाली का शोर कानों में ऐसा घुल गया है कि चंडीगढ़ और शिमला का सुकून भरा वातावरण चार दिन के बाद काटने को आता है। यहां के कोठे पर शोहरत, पैसा, चकाचौंध और नौकरी है जो बदले में हमें जल्दी बूढ़ा कर रही है। जिसकी हम हर दिन बड़ी कीमत चुका रहे हैं। इसने कहीं का छोड़ा भी तो नहीं। इसकी गिरफ्त से छूट भी नहीं पा रही। लेकिन कुछ तो ऐसा है इस कोठे पर जो नहीं है। वो जो हमारे शहरों (सभी के होमटाउन या गांव) में था। इसके भौतिकवादी सुखों और चकाचौंध में सुकून होता तो गप्पे मारने और पेट पकड़ कर हंसने के लिए अपने शहर की और पुराने दोस्तों की अड्डाबाजी याद न आती। कुछ खलता है यहां..जो लगता है कि नहीं है। वो जो पहले था, हमारे शहरों में, हमारे गांव में, हमारे मोहल्ले में..हमारे घर की गली के चौराहे पर..हमारे घर के नुक्कड़ वाली समोसों की दुकान पर ,वो जो मेक्डोनल्ड्स, पिज्जा हट्ट, बरिस्ता या कॉफी कैफे डे में नहीं है। वो जो घर के पास वाले छोटे से बाजार में था लेकिन कनॉट प्लेस या बिग बाजार में नहीं है। वो मजा जो स्कूल वाली टूटे मरगाड वाली आवाज करती साइकल में था, आज कार में नहीं है। वो जो एक बैडरुम वाले शिमला के छोटे से घर में था, आज बड़े से अपार्टमेंट वाले घर में नहीं है। वो जो उन दिनों की रविवार की छुट्टी वाले दिन में था अब तो पता ही नहीं लगता कि रविवार कब आया और चला गया। शाम के आंगन में उतरते वक्त वो जो बच्चों का शोर मोहल्लों में था वो अब अर्पाटमेंट में नहीं होता। यहां की शामें सुनसान रहती हैं। क्योंकि अब बच्चे चोर-सिपाही, ऊंच-नीच का पापड़ा, पिट्ठू गरम,लंगड़ी टांग, घर-घर, मिट्टी के बर्तन बनाना, आंखों पर पट्टी बांधकर एक-दूसरे को ढूंढना जैसे खेल नहीं खेलते। नहीं खेलते तो शोर भी नहीं होता..शोर नहीं होता तो कोई वर्मा अंकल उन्हें डांटते भी नहीं हैं। इस कोठे पर भीड़ तो बहुत है लेकिन रौनक नहीं है। दीवाली बीत भी गई। पता नहीं लगा। हमारे घरों में महीना भर पहले तैयारियां शुरू हो जाती थी। व्हाइट वाश होता ,हम पड़ोसियों के घरों में हुई ताजा व्हाइट वॉश देखने जाते कि फलां ने कौन सा रंग करवाया है. फिर व्हाइट वाश करने वाला आता। सामान लिखवाता। डैडी बाजार से सामान लाते। कई बार व्हाइट वॉश वाले को बताते कि भइया समोसम इतना नहीं इतना डलेगा...जहां-जहां सफेदी होनी है उसमें नील कितना घुलेगा। फिर बीच-बीच में चाय के दौर चलते। सारा सामान एक कमरे में भर दिया जाता। कुछ सामान पड़ोसियों के यहां भी रखा जाता। कभी-कभी पड़ोसियों के घर से भी चाय-पानी आ जाता। व्हाइट वॉश के बाद सज-सज कर बैठ कर देखते थे हम कि आहा..घर नया हो गया है। उन दिनों घर में व्हाइट वॉश और छोटे-छोटे सामान की इतनी खुशी होती थी जितनी आज नए फ्लैट या प्लॉट खरीदने पर भी नहीं होती। पहले छोटी-छोटी चीजें खुशियां देती थी आज बड़ी चीजें और उपलबिधयां भी खुशी नहीं देती। पहले घर में कोई नई चीज आती तो सामने वाली या नीचे वाली आंटी देखने आती..चर्चा होती अब बगल वाले घर में कोई मर भी जाए तो कई दिन बाद पता ललगता है। पहले जब हमारा स्कूल का नतीजा आना होता था तो पड़ोस वाली आंटी भी चिंता से इंतजार करती थी अब मामा-चाचा तक को यह तक खबर नहीं की हमने कितनी पढ़ाई कर ली। हम कहां नौकरी कर रहे हैं। अब हम खुश नहीं रह पाते हैं। छोटी - छोटी खुशीयां हमारे छोटे-छोटे शहरों में आज भी हैं। वे खुशियां हमा&lt;b&gt;&lt;/b&gt;रे बड़े शहरों में आ जाने से अकेली हो गई हैं क्योंकि हम वहां नहीं हैं।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4600603968664327804-1268512173214761522?l=summerhillss.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://summerhillss.blogspot.com/feeds/1268512173214761522/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=4600603968664327804&amp;postID=1268512173214761522' title='2 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4600603968664327804/posts/default/1268512173214761522'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4600603968664327804/posts/default/1268512173214761522'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://summerhillss.blogspot.com/2011/11/blog-post.html' title='इस कोठे पर भीड़ है पर रौनक नहीं....'/><author><name>मनीषा भल्ला</name><uri>http://www.blogger.com/profile/08641339911733741450</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/_XL5MGzuI3Pw/SNVJx1535_I/AAAAAAAAAFM/auzHNlwYHi0/S220/m-2%5B1%5D.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/--lmz5hSwC04/TrqUu0jcB1I/AAAAAAAAAIo/TtSD0DFZ7a0/s72-c/in04b293.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-4600603968664327804.post-1720130554792234361</id><published>2010-08-08T17:05:00.008+05:30</published><updated>2010-08-08T18:06:05.717+05:30</updated><title type='text'>अपनी औलाद के कातिल</title><content type='html'>&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/_XL5MGzuI3Pw/TF6go4DjR3I/AAAAAAAAAHU/Tv9vn_6abLE/s1600/100_3200.JPG"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 320px; height: 240px;" src="http://3.bp.blogspot.com/_XL5MGzuI3Pw/TF6go4DjR3I/AAAAAAAAAHU/Tv9vn_6abLE/s320/100_3200.JPG" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5503012418795816818" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;मेहम चौबिसी का यह ऐतिहासिक चबूतरा है। हरियाणा के रोहतक जिले से अंदाजन 22 किमी की दूरी पर । खाप पंचायतों की ओर से लिए गए महत्वपूर्ण फैसलों के लिए इस चबूतरे की बहुत बहुत मान्यता है । बीते रविवार ( एक अगस्त ) भी यहां खूब गहमा-गहमी रही। यहां सर्वजातिय पंचायत बुलाई गई थी। झक सफेद कुर्ते-पजामें और कंधे पर गमछा लपेटे सात सौ से लेकर एक हजार तक ग्रामीण और पहली बार भारी तादाद में महिलाएं भी पहुंची इस पंचायत में। इससे पहले मैं कुरुक्षेत्र और पाई में आयोजित खाप पंचायतों में भी जा चुकी हूं लेकिन यह पहला मौका था जबकि महिलाओं ने भी पंचायत में भाग लिया हो। विवादित गोत्र विषय पर वक्ताओं ने सरकार के खिलाफ जमकर जहर उगला । महम चौबिसी के इस चबूतरे से शब्द नहीं अंगारे बरसे।  &lt;br /&gt;&lt;br /&gt; कुल मिलाकर बातें तो वही पुरानी थी कि समगोत्री विवाह प्रतिबंधित हो। ऑनर किलिंग पर प्रस्तावित कानून की मुखालफत की गई। हमेशा की तरह मीडिया को भी कोसा। कहने लगे कि मीडिया इन्हें तालीबानी कहना बंद करे। लेकिन इनके तेवर देख और फरमान सुन मीडिया तो क्या हर कोई इन्हें तालीबानी ही कहेगा। किसी वक्ता ने मांग की कि टीवी देखना बंद किया जाए,किसी ने मांग रखी कि लड़कियां नाचना बंद करें, किसी ने सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीशों पर उंगली उठाई,किसी ने कहा कि अगर बच्चे कहना न मानें तो ऐसे बच्चों को मार ही देना चाहिए,किसी ने कहा कि ऑनर किलिंग की बात उठाकर सरकार हमारे सामाजिक अधिकार खत्म करना चाह रही है, किसी ने कहा कि हम खून-खराबे से नहीं डरते , सड़कों पर खून बहा देंगे,किसी ने कहा कि पंचायतें सुप्रीम कोर्ट से ऊपर हैं,अगर ऐसा नहीं है तो सरकार पंचायती राज खत्म करे, किसी ने कहा कि कानून हमारे लिए है हम कानून के लिए नहीं, इसलिए जैसा हम चाहेंगे वैसा कानून बनाएंगे और सरकार को हमारी बात माननी ही होगी क्योंकि सरकारें हम बनाते हैं। किसी ने कहा कि हमें आजादी भगत सिंह,चंद्रशेखर और उद्धम जैसों की बदौलत मिली है इसलिए जरुरत पड़ी तो हम सड़कों पर निकलेंगे और मरने से भी नहीं डरेंगे। किसी ने कहा कि ऊत का गुरु जूत। आग उगलते भाषण सुन जनता से एक आदमी उठा और फिल्मी स्टाइल में कहने लगा कि गोत्र में शादी नहीं होने देंगे चाहे रोज मारना पड़े। &lt;br /&gt;और कुछ इस तरह की बातें हुई जो लिखी नहीं जा सकतीं। इनके मुंह से निकलती आग ने माहौल को गरमा दिया। रीति-रिवाजों की दुहाई दे गांववासियों को भड़का दिया। अपनी राजनीतिक रोटियां सेंकने के लिए यह लोग जनता को गुमराह करते नजर आए। असल बात यह है कि हरियाणा में समगोत्री विवाह न के बराबर है और खाप पंचायतें सारा हो-हल्ला कर रही हैं समगोत्री विवाद पर। हरियाणा ही क्या दक्षिण भारत को छोड़ दिया जाए तो उत्तर भारत में समगोत्री विवाह का फीसद बहुत कम है। खाप पंचायतों का कहना है कि दूसरी जाति में चाहे प्रेम विवाह कर लो लेकिन एक गोत्र में नहीं शादी नहीं होने देंगे। लेकिन हरियाणा में समगोत्री विवाह की समस्या है ही नहीं फिर इतना हल्ला क्यों? गौरतलब है कि मनोज और बबली कांड को छोड़ कर हरियाणा में ऑनर किलिंग के हर केस में विवाह दूसरी जाति में किया गया था और गोत्र तो दूर-दूर तक नही मिलता था। यहां मुद्दा है तो सिर्फ इतना है कि अपना राजनीतिक वर्चस्व खोये हुए कुछ मुट्ठी भर नेताओं को ज्वलंत मुद्दा और मंच मिल गया। कुछ नासमझ लोग इनके सुर में सुर मिला रहे हैं। सत्ताधारी इसलिए नहीं बोल रहे कि उन्हें वोटवैंक खोने का डर है। अगर प्रेम और मनमर्जी से शादी करके यहां के लड़के-लड़कियां समाज और संस्कृति को बिगाड़ रहे हैं तो यह पंचायत के नेता भी कौन सा समाज बनाने की बात कर रहे हैं? जो समाज खून से सना हो...जहां मां-बाप अपनी ही औलाद का खून बहाएं, जो समाज किसी भी छोटी सी बात पर हथियार उठाने के लिए उकसाता हो, जो समाज हमेशा जातिय भेदभाव को बनाये रखना चाहता हो, जो समाज किसी की सुनने को तैयार नहीं,जो समाज औरतों को उनका हक देने को तैयार नहीं ,जिस समाज में शादी के लिए औरतें दूसरे राज्यों से खरीकर लाई जा रही हों,जिस समाज में औरतों को बोलने का अधिकार नहीं....&lt;br /&gt;संस्कृति एक बहती धारा है। जिसमें समयानुसार परिवर्तन होता रहता है। नए और पुराने विचार एक ऐसे मोड़ पर खड़े हैं जहां हथियारों से नहीं दिमाग से काम लेना चाहिए। अन्यथा हरियाणा और पश्चमी उत्तर प्रदेश में स्वयंभू पंचायतें जैसा माहौल तैयार कर रही हैं उससे सड़कों पर खून ही बहेगा वह भी अपनी ही औलाद का।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4600603968664327804-1720130554792234361?l=summerhillss.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://summerhillss.blogspot.com/feeds/1720130554792234361/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=4600603968664327804&amp;postID=1720130554792234361' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4600603968664327804/posts/default/1720130554792234361'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4600603968664327804/posts/default/1720130554792234361'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://summerhillss.blogspot.com/2010/08/blog-post.html' title='अपनी औलाद के कातिल'/><author><name>मनीषा भल्ला</name><uri>http://www.blogger.com/profile/08641339911733741450</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/_XL5MGzuI3Pw/SNVJx1535_I/AAAAAAAAAFM/auzHNlwYHi0/S220/m-2%5B1%5D.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://3.bp.blogspot.com/_XL5MGzuI3Pw/TF6go4DjR3I/AAAAAAAAAHU/Tv9vn_6abLE/s72-c/100_3200.JPG' height='72' width='72'/><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-4600603968664327804.post-4168616946647974870</id><published>2009-04-26T01:42:00.010+05:30</published><updated>2009-06-20T11:06:14.003+05:30</updated><title type='text'>ऐसी दीवानगी...</title><content type='html'>&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/_XL5MGzuI3Pw/SfShteU_HCI/AAAAAAAAAHA/4klm-zpYsa0/s1600-h/women.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 320px; height: 222px;" src="http://3.bp.blogspot.com/_XL5MGzuI3Pw/SfShteU_HCI/AAAAAAAAAHA/4klm-zpYsa0/s320/women.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5329062061693410338" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;रिपोर्टिंग के दौरान एक पागलखाने में जाना हुआ। तरह-तरह की महिलाएं। बाल नोचती, कुछ-कुछ बोलती,अजीबो-गरीब हरकतें करतीं । उनमें एक ऐसी औरत ऐसी भी थी जो हमेशा चुप रहती थी। वहां की मैनेजर ने बताया कि &lt;em&gt;&lt;strong&gt;&lt;em&gt;&lt;strong&gt;यह महिला कभी कुछ भी नहीं बोलती..सभी से अलग-थलग रहती है, सुबह समय पर उठती है, सोती है और खाना खाती है। &lt;/strong&gt;&lt;/em&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/em&gt;जब सब सही है तो भई पागलखाने में क्यों है? शक्लोसूरत से ऊंचे घराने की लगती थी, पढ़ी-लिखी। मैनेजर का कहना था कि &lt;em&gt;&lt;strong&gt;कभी-कभी शाम ढले टेनिस भी खेलती है।&lt;/strong&gt;&lt;/em&gt; यह और भी हैरान कर देने वाली बात थी। मैंने कहा यह पागल तो दिखाई नहीं देती। मैनेजर ने बताया कि इसके पति का यही कहना है कि यह पागल है। उसने बताया महिला के पति का कहना है कि वह उससे प्यार नहीं करती लेकिन प्यार न करने की यह कौन सी सजा है कि उस औरत को पागलखाने में छोड़ दो। मैनेजर ने आगे की कहानी बताई कि &lt;em&gt;&lt;strong&gt;औरत का कहना है कि वह सत्यजित राय (फिल्म निर्माता-लेखक) से प्यार करती है। &lt;/strong&gt;&lt;/em&gt;यह सुनकर मैंने बात हंसी में टाल दी लेकिन मैनेजर उस बात को गंभीरता से बता रही थी। यह सच था कि वह पगली सत्यजित राय से इतनी मोहब्बत करती थी कि न तो अपनी शादी को स्वीकार कर सकी और न पति से प्यार कर सकी। राय से उसकी दीवानगी उसका पागलपन बन गई। जिसे उसने कभी देखा तक नहीं था। वह जानती थी राय उसे कभी मिल ही नहीं सकते। लेकिन हद के पार दीवानगी ने उसे पागलखाने जरूर पहुंचा दिया था।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4600603968664327804-4168616946647974870?l=summerhillss.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://summerhillss.blogspot.com/feeds/4168616946647974870/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=4600603968664327804&amp;postID=4168616946647974870' title='8 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4600603968664327804/posts/default/4168616946647974870'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4600603968664327804/posts/default/4168616946647974870'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://summerhillss.blogspot.com/2009/04/blog-post.html' title='ऐसी दीवानगी...'/><author><name>मनीषा भल्ला</name><uri>http://www.blogger.com/profile/08641339911733741450</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/_XL5MGzuI3Pw/SNVJx1535_I/AAAAAAAAAFM/auzHNlwYHi0/S220/m-2%5B1%5D.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://3.bp.blogspot.com/_XL5MGzuI3Pw/SfShteU_HCI/AAAAAAAAAHA/4klm-zpYsa0/s72-c/women.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>8</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-4600603968664327804.post-3541944804508112905</id><published>2008-11-26T23:21:00.012+05:30</published><updated>2008-11-27T00:08:03.737+05:30</updated><title type='text'>ईंधन....</title><content type='html'>&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/_XL5MGzuI3Pw/SS2WFok-anI/AAAAAAAAAGE/KEZYeNuC4Rc/s1600-h/untitled.bmp"&gt;&lt;img style="float:right; margin:0 0 10px 10px;cursor:pointer; cursor:hand;width: 320px; height: 226px;" src="http://4.bp.blogspot.com/_XL5MGzuI3Pw/SS2WFok-anI/AAAAAAAAAGE/KEZYeNuC4Rc/s320/untitled.bmp" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5273035762256734834" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt; अभी-अभी एक दोस्त ने भेजी है...बचपन में खेल खेलते वक्त दोस्तों से होने वाले झगड़े याद आ गए...पता नहीं उनमें से कौन कहां है। किसी की भी खबर नहीं। कोई मिल भी जाए तो पहचाना तक नहीं जाएगा। मेरा बचपन तो खैर गांव में नहीं समरहिल (शिमला) में बीता है। घर रेलवे स्टेशन के पास था। इसलिए खेलने स्टेशन पर ही जाया करते थे...रेल की पटरियों और 100 नंबर सुरंग (समरहिल स्टेशन की सुरंग) में । मैं आज भी हर तीन या छह महीनो में समरहिल जाती हूं। वहां के रेलवे स्टेशन पर घंटों बैठकर वापिस आ जाती हूं। पता नहीं  क्या है जो वहां खींच ले जाता है । जब एक तरह की चुप्पी..सन्नाटे में जाने को मन करता है जो सुकून दे तो समरहिल ही जाती हूं । वहां जाने से मन कभी नहीं भर सकता है। लौटते वक्त मुड़-मुड़ कर स्टेशन को देखना..सच में मां बनने के बाद आज भी वहां जाने पर लगता है कि &lt;em&gt;मैं छोटी से नीले रंग की फ्रॉक पहन कर 'गागे' 'दिनेश', 'रेनू', 'रेखा' के पीछे भाग रही हूं...भागते-भागते सुरंग में घुस जाती हूं..जहां मेरी आवाज गूंजने लगती है...फिर सुरंग के काले अंधेरे से डरकर मैं वहां से बाहर निकल आती हूं..गागा मुझे मनाने के लिए खेलने के लिए अपनी गाड़ी दे देता है। &lt;/em&gt;  सब कुछ आज भी मंदिर की घंटियों की तरह कानों  गूंजता हैं। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;   ईंधन&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;छोटे थे, माँ उपले थापा करती थी&lt;br /&gt;हम उपलों पर शक्लें गूँधा करते थे&lt;br /&gt;आँख लगाकर - कान बनाकर&lt;br /&gt;नाक सजाकर -&lt;br /&gt;पगड़ी वाला, टोपी वाला&lt;br /&gt;मेरा उपला -&lt;br /&gt;तेरा उपला -&lt;br /&gt;अपने-अपने जाने-पहचाने नामों से&lt;br /&gt;उपले थापा करते थे&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हँसता-खेलता सूरज रोज़ सवेरे आकर&lt;br /&gt;गोबर के उपलों पे खेला करता था&lt;br /&gt;रात को आँगन में जब चूल्हा जलता था&lt;br /&gt;हम सारे चूल्हा घेर के बैठे रहते थे&lt;br /&gt;किस उपले की बारी आयी&lt;br /&gt;किसका उपला राख हुआ&lt;br /&gt;वो पंडित था -&lt;br /&gt;इक मुन्ना था -&lt;br /&gt;इक दशरथ था -&lt;br /&gt;बरसों बाद - मैं&lt;br /&gt;श्मशान में बैठा सोच रहा हूँ&lt;br /&gt;आज की रात इस वक्त के जलते चूल्हे में&lt;br /&gt;इक दोस्त का उपला और गया!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;-- &lt;strong&gt;गुलज़ार&lt;/strong&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4600603968664327804-3541944804508112905?l=summerhillss.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://summerhillss.blogspot.com/feeds/3541944804508112905/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=4600603968664327804&amp;postID=3541944804508112905' title='8 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4600603968664327804/posts/default/3541944804508112905'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4600603968664327804/posts/default/3541944804508112905'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://summerhillss.blogspot.com/2008/11/blog-post_26.html' title='ईंधन....'/><author><name>मनीषा भल्ला</name><uri>http://www.blogger.com/profile/08641339911733741450</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/_XL5MGzuI3Pw/SNVJx1535_I/AAAAAAAAAFM/auzHNlwYHi0/S220/m-2%5B1%5D.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/_XL5MGzuI3Pw/SS2WFok-anI/AAAAAAAAAGE/KEZYeNuC4Rc/s72-c/untitled.bmp' height='72' width='72'/><thr:total>8</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-4600603968664327804.post-5922128546133501957</id><published>2008-11-17T03:16:00.023+05:30</published><updated>2008-11-19T22:56:34.097+05:30</updated><title type='text'>दिल्ली में दान</title><content type='html'>&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/_XL5MGzuI3Pw/SSRHiz3GY-I/AAAAAAAAAF8/ges5CyGKkUk/s1600-h/untitled.bmp"&gt;&lt;img style="display:block; margin:0px auto 10px; text-align:center;cursor:pointer; cursor:hand;width: 320px; height: 240px;" src="http://4.bp.blogspot.com/_XL5MGzuI3Pw/SSRHiz3GY-I/AAAAAAAAAF8/ges5CyGKkUk/s320/untitled.bmp" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5270416127292761058" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;दिल्ली में दान..&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लगभग एक महीने से ज्यादा होने को आया मुझे दिल्ली में। यहां की दौड़ती-भागती जिंदगी की अपने शहर चंडीगढ़ से तुलना करने के कोई न कोई मौका मिल जाता है। मयूर विहार समाचार अपार्टमेंट के पास की मार्केट में एक छोटा सा ढाबा है। बिना छत्त के। बहुत छोटी से साफ-सुथरी रेहड़ी पर रोज पांच सब्जियां बनाता है राजकुमार। साथ में तंदूर की कड़क रोटी की बजाए मुलायम और फूली हुई तवे की चपाती । इस इलाके में रहने वाले ज्यादातर लड़के-लड़कियां और वह लोग जिनके घर चूल्हा-चौंका नहीं है ,यहीं खाना खाते हैं। राजकुमार को मेरे आने का खासतौर पर इंतजार रहता है। चूंकि वह पंजाबी है। लुधियाना का रहने वाला। इसलिए पंजाबी में अपने घर और कारोबार के रोनेधोने मुझे सुनाकर काफी राहत सी महसूस करता है। फिर समय मिले तो लुधियाना की तंग गलियों,स्वेटर, बिजनेस और वहां के गोटा-किनारी की बातें भी कर लेता है। बातों-बातों में साग और मक्की की रोटी और अमृतसरी वड़ियों का स्वाद भी याद दिला देता है। साथ की साथ छोटू को जूठे बर्तनों पर तेज-तेज हाथ चलाने के लिए भी कहता है।  &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आज उसने मुझसे कहा कि 'मटर-पनीर खाओगे?' मैंने यह कहकर मना कर दिया कि मैं रात को हल्का खाना ही खाती हूं। मैंने उससे पूछा कि क्या बात है आज मटर-पनीर क्यों बनाया है? तो कहने लगा कि 'एक अपार्टमेंट में बड़े बाबू जी रहते हैं न अपने माता-पिता की याद में दान करवा रहे हैं। उन्होंने मुझे यह कहकर पैसे दे दिए कि लोगों को खाना खिला देना।' अब बेचारा राजकुमार परेशान है दान के इस तरीके से कि किसे खाना खिलाए किसी न खिलाए।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4600603968664327804-5922128546133501957?l=summerhillss.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://summerhillss.blogspot.com/feeds/5922128546133501957/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=4600603968664327804&amp;postID=5922128546133501957' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4600603968664327804/posts/default/5922128546133501957'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4600603968664327804/posts/default/5922128546133501957'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://summerhillss.blogspot.com/2008/11/blog-post_17.html' title='दिल्ली में दान'/><author><name>मनीषा भल्ला</name><uri>http://www.blogger.com/profile/08641339911733741450</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/_XL5MGzuI3Pw/SNVJx1535_I/AAAAAAAAAFM/auzHNlwYHi0/S220/m-2%5B1%5D.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/_XL5MGzuI3Pw/SSRHiz3GY-I/AAAAAAAAAF8/ges5CyGKkUk/s72-c/untitled.bmp' height='72' width='72'/><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-4600603968664327804.post-1461557127728727985</id><published>2008-11-17T02:13:00.021+05:30</published><updated>2008-11-17T02:43:24.584+05:30</updated><title type='text'>अगर इसे कुछ हो गया तो</title><content type='html'>&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/_XL5MGzuI3Pw/SSCKqmNVxHI/AAAAAAAAAF0/wdKcMjbontQ/s1600-h/godtestbroken%2520heart1.jpg"&gt;&lt;img style="display:block; margin:0px auto 10px; text-align:center;cursor:pointer; cursor:hand;width: 320px; height: 286px;" src="http://2.bp.blogspot.com/_XL5MGzuI3Pw/SSCKqmNVxHI/AAAAAAAAAF0/wdKcMjbontQ/s320/godtestbroken%2520heart1.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5269364028439118962" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'&lt;strong&gt;अगर इसे कुछ हो गया तो..&lt;/strong&gt;'&lt;br /&gt; &lt;br /&gt; उस दिन उसकी बीवी को मिरगी का दौरा पड़ा था। डॉक्टरों के मुंह से यह सुनकर वह परेशान हो गया। बीवी की बीमारी की चिंता उसे घुन की तरह खाने लगी। अंदर ही अंदर वह खोखला हो चुका था। थक चुका था यह सोचकर कि अगर उसकी बीवी को कुछ हो गया तो...। उसने अपनी बीवी को नहीं बताया कि उसे मिरगी का दौरा पड़ा था। कह दिया कि नर्वस सिस्टम थोड़ा कमजोर है, ठीक होने में समय लगेगा। कुछ महीनों बाद उसकी अपनी तबीयत खराब हुई तो उसे डॉक्टर के पास ले जाया गया। जांच करने पर पता लगा कि उसे दिल की बीमारी है। उसकी बीवी ने उसे बताया कि उसका ब्लडप्रैशर लो हो गया था। बीवी की चिंता ने उसे दिल का रोगी बना दिया। पति के बालों में उंगलियां चलाते हुए वह उसे निहारती रही। दोनों एक-दूसरे को देखने लगे । दोनों की आंखों में कई सवाल तैर रहे थे । एक दूसरे कि बीमारी के बारे में तो पता है इन्हें लेकिन अपनी-अपनी बीमारी से दोनों ही अनजान हैं। दोनों सोच रहे हैं कि  'अगर इसे कुछ हो गया तो....'&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4600603968664327804-1461557127728727985?l=summerhillss.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://summerhillss.blogspot.com/feeds/1461557127728727985/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=4600603968664327804&amp;postID=1461557127728727985' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4600603968664327804/posts/default/1461557127728727985'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4600603968664327804/posts/default/1461557127728727985'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://summerhillss.blogspot.com/2008/11/blog-post.html' title='अगर इसे कुछ हो गया तो'/><author><name>मनीषा भल्ला</name><uri>http://www.blogger.com/profile/08641339911733741450</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/_XL5MGzuI3Pw/SNVJx1535_I/AAAAAAAAAFM/auzHNlwYHi0/S220/m-2%5B1%5D.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://2.bp.blogspot.com/_XL5MGzuI3Pw/SSCKqmNVxHI/AAAAAAAAAF0/wdKcMjbontQ/s72-c/godtestbroken%2520heart1.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-4600603968664327804.post-4049149131320939906</id><published>2008-10-12T18:26:00.015+05:30</published><updated>2008-12-04T10:05:48.953+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='मुंबई में हमला'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='देश पर हमला'/><title type='text'>हिजड़ों की सुध कौन लेगा!</title><content type='html'>आतंकवाद के खिलाफ मुंबई समेत देश भर में आम आदमी से लेकर फिल्मी सितारे तक सड़कों पर हैं। शहीद मेजर संदीप उन्नीकृष्णन के पिता पर केरल के मुख्यमंत्री की शर्मनाक टिप्पणी से तो देशवासी तिलमिला कर रह गए हैं। नेताओं के खिलाफ जनता का खून तो खौल रहा है लेकिन कब तक? दो दिन... चार दिन... महीना... दो महीना... सड़कों पर मौजूद ये जमावड़ा आंदोलन में बदलेगा, इसमें संदेह है। और वो भी ऐसा आंदोलन जो इस जनता की तकदीर बदल सके। रोजी-रोटी की जरूरतें जनसैलाब के गुस्से पर बर्फ की परत बनकर जम जाएगी। टीवी चैनलों पर आतंकवाद के खिलाफ बयान दे रही राजस्थान की मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे के उस बयान को हम भूल चुके हैं जो उन्होंने जयपुर धमाकों के बाद दिया था। भूल गए हैं न आप? पहले तो महारानी साहिबा रात को किसी को मिली ही नहीं। जनता उन्हें ढूंढती रही। जब मिलीं, तो मोहतरमा कहती हैं कि 'मुझे दुख है कि धमाकों में &lt;strong&gt;छोटे-छोटे &lt;/strong&gt; लोग मारे गए'... जनता ने बवाल मचाया... अखबारों की सुर्खियां बनीं, लेकिन क्या हुआ? कुछ नहीं। किसी ने इन वसुंधराओं, नकवियों और अच्युतानंदनों की जुबान पर लगाम नहीं कसी... कस भी नहीं सकती... जब जबान पर लगाने का मौका आता है तो यही जनता अपनी पूरी बेवकूफी के साथ उन्हीं को अपना मत और मति दोनों दे आती है... &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जो घर से मरने के लिए निकलता है दुनिया उससे डरती है। आतंकी हमेशा मरने के लिए निकलता है। कहीं न कहीं तो उनके जुनून के बारे में सोचकर भी हैरत होती है कि ऐसा जुनून भी क्या कि जब जीवन की समझ आने लगे तो सिर पर कफन बांध मौत बांटने और खुद भी उसका शिकार होने के लिए निकल पड़ते हैं यह । सोचकर देखें कि अगर आतंकियों के दिलों में तबाही का इतना तेजाब और जुनून हो सकता है तो हमारे दिलों में इन हिजड़े नेताओं की जुबान नोचने की हिम्मत क्यों नहीं? कैसे उस शख्स ने शहीद के परिवार से माफी तक मांगने से साफ इनकार कर दिया? जबकि वो भी जानता है कि उसी के वोट की बदौलत वो इस कुर्सी पर विराजमान है... इस देश की जनता को 20-20 साल के छोकरे छकाकर चले गए... क्या करोड़ों की आबादी में कुछ हजार भी ऐसे नहीं जो पहले इन हिजड़ों की सुध लें, जिनकी नाकामी सबके सामने है... जिनकी बेशर्मी सबके सामने है और जिनकी गंदी जुबान भी सब सुन रहे हैं... जिन्होंने उन्हें ये कुर्सी सौंपी है, वो इस वादे के साथ सौंपी है कि जब चाहेंगे वो ले भी लेंगे...लेकिन नहीं, शायद हमारा ही खून जम गया है...&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4600603968664327804-4049149131320939906?l=summerhillss.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://summerhillss.blogspot.com/feeds/4049149131320939906/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=4600603968664327804&amp;postID=4049149131320939906' title='3 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4600603968664327804/posts/default/4049149131320939906'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4600603968664327804/posts/default/4049149131320939906'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://summerhillss.blogspot.com/2008/10/blog-post.html' title='हिजड़ों की सुध कौन लेगा!'/><author><name>मनीषा भल्ला</name><uri>http://www.blogger.com/profile/08641339911733741450</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/_XL5MGzuI3Pw/SNVJx1535_I/AAAAAAAAAFM/auzHNlwYHi0/S220/m-2%5B1%5D.jpg'/></author><thr:total>3</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-4600603968664327804.post-6747991834644403373</id><published>2008-09-16T00:05:00.035+05:30</published><updated>2008-11-07T08:44:46.856+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='इंटरव्यू'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='मोनिका बेदी'/><title type='text'>कसूरवार है तो डॉन की माशूका का बाप!</title><content type='html'>&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://2.bp.blogspot.com/_XL5MGzuI3Pw/SROx35gJuDI/AAAAAAAAAFk/NDYWtuC_RtI/s1600-h/Monika.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 279px; height: 320px;" src="http://2.bp.blogspot.com/_XL5MGzuI3Pw/SROx35gJuDI/AAAAAAAAAFk/NDYWtuC_RtI/s320/Monika.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5265747963212838962" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;जेल से छूटने के बाद कुछ दिन मीडिया की सुर्खियां बनी मोनिका बेदी बाद में गुमनामी की जिंदगी जी रही थी। मेरी जब उनसे उनके गांव चब्बेवाल (होशियारपुर पंजाब) मुलाकात हुई तो मोनिका में छटपटाहट थी। फिर से बड़े या छोटे पर्दे पर आ जाने की। बिग बॉस के घर राहुल से उसका नाम क्या जुड़ा कि मीडिया ने डॉन की माशूका की खबरों को फिर से हवा देना शुरू कर दिया। मोनिका को लेकर दोस्तों के साथ बैठकर अलग-अलग तरह की बातें होती हैं। लेकिन जानते हैं क्या सपने पूरे करने की तलाश में मोनिका अपराध की खाई तक कैसी पहुंची...कौन है इसके लिए जिम्मेदार..इसके जिम्मेदार हैं मोनिका के पिता प्रेम बेदी। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जिस रोज डॉन की यह माशूका जेल से अपने गांव चब्बेवाल पहुंची,उसके चंद रोज बाद मैं मोनिका से इंटरव्यू करने चब्बेवाल गई थी। वह कहीं गई हुई थीं। जल्दी पहुंचने के कारण उनके पिता प्रेम बेदी मुझसे काफी देर तक बात करते रहे। &lt;br /&gt;बीते 35 साल से वह नार्वे में रेडीमेड गारमेंट्स का बिजनेस कर रहे हैं। मोनिका का भाई बॉबी भी इसी काम में है। मैंने पूछा आप मौनिका से नाराज नहीं तो कहने लगे कि बाप ही नाराज हो जाता तो कहां जाती मेरी बेटी...कौन बचाता इसे...। मोनिका की मां पैरालिसिस के बाद बिस्तर पर थीं। चब्बेवाल में रह रहे मोनिका के चाचा ने बड़े भाई प्रेम का साथ नहीं दिया क्योंकि वह बड़े भाई और मोनिका से नाराज थे। उस रोज उन्होंने मेरे साथ अपने दिल के कई राज खोले। कहने लगे कि मोनिका घर में सबसे ज्यादा प्यार मुझसे ही करती थी,परिवार ने उसे इस मुसीबत में अकेला छोड़ दिया लेकिन मैं कैसे छोड़ देता अपनी बच्ची को? फिर मुझसे पूछने लगे कि मेरी बेटी ने इतना बड़ा अपराध तो नहीं किया जितनी उसे सजा मिली है। मैंने पूछा कि पिता होने के नाते आपको कैसे पता नहीं लगा कि आपकी बेटी क्या कर रही है... उसे किसके फोन आ रहे हैं? उनका कहना था कि किसी फोन कॉल या मोनिका के बिहेवियर से इसका पता तक नहीं चला कि ऐसा हो रहा है। प्रेम बेदी को अपनी लाडली से इतना प्रेम है कि जब वह जेल में पहली बार मोनिका से मिले तो मोनिका ने उनसे रोते हुए सॉरी कहा... और प्रेम बेदी ने बेटी का गुनाह माफ कर दिया। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वह कहने लगे कि मोनिका तो कमसिन थी, भोली थी, अनजान थी। वह नार्वे में पली बढ़ी इन लोगों (अबू सलेम) की मंशा नहीं समझती थी। वह कहने लगे कि उन्होंने मेरी बेटी को मायानगरी के झूठे ख्वाब दिखाए और कहा कि हम तुम्हें बहुत ऊपर तक पहुंचा देंगे। प्रेम बेदी की बातों से एक बात साफ थी कि बड़े बैनर की फिल्में हथियाने के लिए मोनिका अबू के जाल में फंसी। प्रेम बेदी ने अपनी बेटी की कभी सुध तक नहीं ली। अगर मोनिका नार्वे में पली-बढ़ी थी तो प्रेम बेदी तो ऐसे लोगों की मंशा से अनजान नहीं थे। उन्होंने क्यों इस बात का पता नहीं लगाया कि मोनिका को किसके फोन आ रहे है या फिर मोनिका को आगाह नहीं किया?   &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;प्रेम बेदी इस गलती को मानते भी हैं। मोनिका के चाचा भी इसके लिए बड़े भाई प्रेम को जिम्मेदार मानते हैं। उन्होंने तो मोनिका से बात तक करनी छोड़ दी थी। उन्होंने मुझसे कहा कि सब भाई साहब के प्यार का नतीजा है। &lt;br /&gt;हर कोई चाहता है कि उसकी औलाद तरक्की करे उसका नाम रोशन करे, लेकिन संघर्ष के थपेड़ों से बचने के लिए और किनारे की तलाश में क्या किसी गलत आदमी का तो सहारा नहीं लिया जा रहा... गलत राह पर तो नहीं चला जा रहा, यह मोनिका के पिता को ही देखना था। औलाद की चाल मां-बाप को बता देती है कि वह किस राह पर है तो प्रेम बेदी इससे कैसे अनजान रहे। पिता की नजरअंदाजी ने छरहरे बदन वाली संगमरर जैसी सफेद सुंदर सौम्य, विनम्र पापा की इस लाडली के तार अपराधियों के साथ ऐसे जोड़े कि जिसे मोनिका शायद इस जन्म में धो नहीं सकती।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4600603968664327804-6747991834644403373?l=summerhillss.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://summerhillss.blogspot.com/feeds/6747991834644403373/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=4600603968664327804&amp;postID=6747991834644403373' title='5 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4600603968664327804/posts/default/6747991834644403373'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4600603968664327804/posts/default/6747991834644403373'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://summerhillss.blogspot.com/2008/09/kasura.html' title='कसूरवार है तो डॉन की माशूका का बाप!'/><author><name>मनीषा भल्ला</name><uri>http://www.blogger.com/profile/08641339911733741450</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/_XL5MGzuI3Pw/SNVJx1535_I/AAAAAAAAAFM/auzHNlwYHi0/S220/m-2%5B1%5D.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://2.bp.blogspot.com/_XL5MGzuI3Pw/SROx35gJuDI/AAAAAAAAAFk/NDYWtuC_RtI/s72-c/Monika.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>5</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-4600603968664327804.post-2013774989743914934</id><published>2008-08-11T15:32:00.026+05:30</published><updated>2008-09-02T02:17:37.918+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='सआदत हसन मंटो'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='घर'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='लेखक'/><title type='text'>मंटो कौन था!</title><content type='html'>&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://1.bp.blogspot.com/_XL5MGzuI3Pw/SLr9n0qpA0I/AAAAAAAAADQ/S_vnvh1WcUs/s1600-h/Manto.jpg"&gt;&lt;img style="float:right; margin:0 0 10px 10px;cursor:pointer; cursor:hand;" src="http://1.bp.blogspot.com/_XL5MGzuI3Pw/SLr9n0qpA0I/AAAAAAAAADQ/S_vnvh1WcUs/s320/Manto.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5240779976993211202" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;मंटो मेरे पसंदीदा लेखक हैं। मालूम हुआ कि उर्दू के इस बेबाक लेखक का गांव मेरे शहर से कुछ ही किलोमीटर पर है। एक रोज मन में आया और मैं मंटो के गांव के लिए चल पड़ी। तकरीबन 45 मिनट में मैं समराला पहुंच गई थी। यहां से 5 किलोमीटर पर गांव पपड़ौदी जाना था मुझे। मैंने एक टैंपो किया जो खेतों के बीचों-बीच होता हुआ मुझे गांव ले गया। ख्याल था कि न जाने वहां मंटों के नाम पर क्या-क्या होगा... कौन-कौन मिलेगा... गांववाले तो बहुत खुश होंगे कि उनके गांव के इस लेखक के बारे में शहर से कोई कुछ जानने आया है।  &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;गांव में पहली दुकान किरयाने की थी। मैंने पूछा कि भई यह मंटो का घर कहां है... कहने लगा कि मुझे नहीं मालूम है। फिर मैंने कहा कि वो जो लेखक हुआ है बहुत मशहूर... उसे तब भी समझ नहीं आया। कहने लगा कि सथ (चबूतरा) पर चले जाओ शायद कुछ मालूम लग जाए...&lt;br /&gt;मैं वहां चली गई। कुछ बुजुर्गवार बैठे थे... मैंने कहा कि मुझे मंटो के घर जाना है तो हर कोई सोचने लगा कि आखिर मंटो कौन है... मैंने समझाया वो जो बहुत बड़े नामी लिखारी हैं... यहां पैदा हुए थे...मैंने पूरा नाम भी बताया..सआदत हसन मंटो... किसी ने पूछा मुसलमान है क्या... मैंने कहा हां...बोले फिर तो फरियाद अली ही जानता होगा। हैरान खड़ी मैं सोचने लगी कि इंकलाबी कलमकार मंटो ताउम्र निजाम में नुक्स ढूंढते रहे लेकिन इस अवाम का नुक्स कौन देखे जो उनके नाम तक से वाकिफ नहीं। उन्हें याद करना तो दूर उनका नाम तक नहीं जानता कोई। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://3.bp.blogspot.com/_XL5MGzuI3Pw/SLr877_jStI/AAAAAAAAADI/NRS_71CAel8/s1600-h/Manto%27s+House.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;" src="http://3.bp.blogspot.com/_XL5MGzuI3Pw/SLr877_jStI/AAAAAAAAADI/NRS_71CAel8/s320/Manto%27s+House.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5240779223045720786" /&gt;&lt;/a&gt;फिर भी फरियाद अली पर भरोसा था मुझे... उन्हें बुलाया गया। दुआसलाम के बाद मैंने कहा कि मैं मंटो के बारे में जानने आई हूं। मंटो का नाम सुनते ही फरियाद की आंखों में चमक आ गई। कहने लगे कि हां मैं जानता हूं..वह मेरे बड़े भाईजान के साथ यहां हॉकी खेला करते थे। उन्होंने वहां बैठे बुजुर्गों से कहा कि वो अपना कश्मीरियों का लड़का...। मंटो के बारे में इस कड़वी सच्चाई को मैं हजम नहीं कर पा रही थी। दरअसल, मंटो के मामले में मैं काफी संवेदनशील हूं। गुस्सा भी आ रहा था और हैरत भी हो रही थी। इसके बाद फरियाद अली मुझे वह घर दिखाने ले गए, जहां मंटो का जन्म हुआ था। अब यहां गांव के सरपंच रहते हैं। उनकी बड़ी सी हवेली का छोटा सा कमरा है यह। सरपंच ने मुझसे बात नहीं की... उन्हें लगा कि कहीं उनसे यह कमरा न छिन जाए। मैंने फरियाद अली से पूछा कि आखिर सरकार और गांव के लोग क्यों नहीं यहां मंटो के नाम पर कुछ करते। तो कहने लगे कि यह क्या जाने कि मंटो कौन था...इनकी नजर में तो वह बस एक मुसलमान था...&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4600603968664327804-2013774989743914934?l=summerhillss.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://summerhillss.blogspot.com/feeds/2013774989743914934/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=4600603968664327804&amp;postID=2013774989743914934' title='25 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4600603968664327804/posts/default/2013774989743914934'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4600603968664327804/posts/default/2013774989743914934'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://summerhillss.blogspot.com/2008/08/blog-post.html' title='मंटो कौन था!'/><author><name>मनीषा भल्ला</name><uri>http://www.blogger.com/profile/08641339911733741450</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/_XL5MGzuI3Pw/SNVJx1535_I/AAAAAAAAAFM/auzHNlwYHi0/S220/m-2%5B1%5D.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://1.bp.blogspot.com/_XL5MGzuI3Pw/SLr9n0qpA0I/AAAAAAAAADQ/S_vnvh1WcUs/s72-c/Manto.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>25</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-4600603968664327804.post-1320383145793218321</id><published>2008-07-12T20:19:00.000+05:30</published><updated>2008-07-12T20:26:11.928+05:30</updated><title type='text'>ओ डार्लिंग...लव कैन नैवर डाई..</title><content type='html'>पिछली पोस्‍ट से आगे....&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अपने प्रेम की बात करते हुए कॉरल की आंखें चमक उठती थीं। लगता था यह ऑफिसर की याद उसके जख्‍मों पर मरहम रखती है। एक दिन मैंने पूछा आपको याद आती है उस आदमी की....। कॉरल हंसकर कहती-ओ डार्लिंग...लव कैन नैवर डाय। वह यहां कैसे आई, बताती थी-सोलह साल की थी तो यहां अपनी आंटी के पास आई थी। उनके घर एक यंग आईएएस का आना जाना था जिससे मेरी दोस्‍ती हो गई। वापस लौटी तो मैंने अपने घर में उसके बारे में बताया लेकिन मेरे घरवाले उससे मेरी शादी के लिए राजी नहीं हुए। मेरी शादी ऑस्‍टरेलिया में ही कर दी गई। मेरा पति शराबी था और मारपीट भी करता था। जब मैं थक गई तो, वहां से भाग आई। मेरी मुलाकात होम सेक्रेटरी से दोबारा हुई। हम लोग मिलते रहे। एक रोज उसने भी कहा कि वह मुझसे मेरी शादी नहीं कर सकता, क्‍योंकि उसे कैंसर था और वह ऐसी स्थिति में मुझसे शादी करके मे्रा जीवन बरबाद नहीं करना चाहता था। वह वास्‍तव में कुछ दिनों बाद मर गया। मेरा जीवन उसी दिन खत्‍म हो गया समझो। मैं अकेली थी और इसे देखकर कई मर्दों ने मुझे तंग करना शुरू कर दिया। मैं डर गई और खुद को बचाने के लिए कोलकाता में मदर टेरेसा के पास चली गई। मिशनरीज ऑफ चैरिटी में एक दिन एक अमेरिकन दान देने आया। वह हॉलीवुड के मशहूर स्‍टूडियो के मालिक का बेटा था। एडवर्ड कैट़स उसका नाम था। एक दिन उसने मुझे शादी के लिए ऑफर किया। मदर टेरेसा के आशीर्वाद से हमारी शादी हो गई। कैटस अमेरिका गया और कहते हुए गया कि वहां मुझे बुला लेगा। वो कभी नहीं लौटा और मैं फिर अकेली हो गई। मुझे एक दिन कैटस के पिता का पत्र मिला कि उसने आत्‍महत्‍या कर ली है। मैं टूट चुकी थी और यहां चंडीगढ़ दोबारा आ गई। मेरे पास पैसे नहीं थे। मुझे कश्‍मीर में संयुक्‍त राष्‍ट के ऑफिस में काम करना पड़ा। &lt;br /&gt;कॉरल की कहानी में दुख अभी और भी थे। उसे यहां शोषण का शिकार होना पड़ा। कश्‍मीर से परेशान होकर वह फिर चंडीगढ़ आ गई। पूरे जीवन की कुल कमाई थी उसके 6 बच्‍चे। इनमें से कोई यहां रुकने को तैयार नहीं था। सब यहां से चले गए, उसे अकेला छोड़कर। वह यहां से जाना नहीं चाहती थी लेकिन अपनी बेटी से मिलने के लिए हर पल तडपती रहती। वह बताती है पहले बच्‍चे पैसे भेज देते थे लेकिन बाद में सब बंद हो गया। कॉलिन बहुत धनी नहीं थी पर परवाह बहुत करती थी। &lt;br /&gt;जब मैं कॉरल से मिली तो 6 महीने से उसे कहीं से पैसे नहीं मिले थे। उसकी आखिरी ख्‍वाहिश क्‍या है....मैं पूछती तो उसकी सांस रुकने लगती। मानों उसे पता था कि उसकी यह इच्‍छा कभी पूरी नहीं हो पाएगी। वह फफक कर रो पड़ती है। आप उसके पास क्‍यों नहीं चली गईं...कॉरल ने बताया था-मैंने कागज तैयार करवाए थे लेकिन ऐन वक्‍त पर एजेंट ने पंद्रह हजार रुपए मांगे जो मेरे पास नहीं थे। उसी दौरान मुझे पैरालि‍सिस हो गया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तो ये थी कॉरल की कहानी। मैं इसमें बहुत सारे ऐसे इमोशन्‍स को शायद उतार भी नहीं पाई हूं जो उससे बातचीत के दौरान हमारे बीच जिंदा थे। कॉरल को वापस भिजवा सकने और उसकी बेटी से मिलवा पाने की कोशिश मैं नहीं कर पाई, क्‍यों.....शायद मैं इस बात की गंभीरता को उस वक्‍त समझी ही नहीं। मैंने जॉब जाइन ही की थी और शायद संसाधन भी इतने नहीं थे उस वक्‍त। आज मैं उस वक्‍त को वापस लाना चाहती हूं काश.....एक बार कॉरल जिंदा हो जाए और मैं उसके लिए कुछ कर सकूं। उसके पडोसियों ने बताया कि कॉरल के मरने का पता उन्‍हें भी रिक्‍शा में जाते हुए एक ताबूत को देखकर ही लगा था। कॉरल मर गई, लेकिन उसकी कहानी जिंदा है मेरी यादों में।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4600603968664327804-1320383145793218321?l=summerhillss.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://summerhillss.blogspot.com/feeds/1320383145793218321/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=4600603968664327804&amp;postID=1320383145793218321' title='6 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4600603968664327804/posts/default/1320383145793218321'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4600603968664327804/posts/default/1320383145793218321'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://summerhillss.blogspot.com/2008/07/blog-post_12.html' title='ओ डार्लिंग...लव कैन नैवर डाई..'/><author><name>मनीषा भल्ला</name><uri>http://www.blogger.com/profile/08641339911733741450</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/_XL5MGzuI3Pw/SNVJx1535_I/AAAAAAAAAFM/auzHNlwYHi0/S220/m-2%5B1%5D.jpg'/></author><thr:total>6</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-4600603968664327804.post-641338825791905650</id><published>2008-07-10T22:30:00.000+05:30</published><updated>2008-07-11T11:29:12.146+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='याद'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='प्रेम'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='अपराधबोध'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='जिंदगी'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='कॉरल'/><title type='text'>मुझे माफ करना कॉरल.....</title><content type='html'>&lt;strong&gt; क्‍या होता है प्‍यार, क्‍या होता है उसका निबाह और क्‍या होता है किसी के लिए खुद को फना कर देना....। ये सब हम फिल्‍मों में देखते हैं। महसूस करते हैं और कई बार अपनी आंख भी भिगो लेते हैं। लेकिन मैंने प्‍यार का जो साक्षात रूप अपने जीवन में देखा वो अतुलनीय है। उससे मिलने के बाद ही मैंने जाना प्‍यार क्‍या होता है। कैसे एक औरत अपने निपट अकेलेपन के जंगल में प्रेम के धुंधले जुगनू को देखते हुए पूरा जीवन बिता देती है। कैसे वो मौत के बिस्‍तर पर पड़ी रहकर भी अपने प्रेम को याद कर ठहाका लगा सकती है। प्रेम में कितनी ताकत होती है ये मैंने कॉरल को देखकर जाना था। उसने प्रेम किया लेकिन ईश्‍वर ने उसके भाग्‍य में सिर्फ अकेलापन और दर्द लिखा था। वो भागती रही उससे, लेकिन समय का फंदा उसे फंसा ही लेता था हर बार। एक औरत के लिए प्रेम कितना महंगा साबित हो सकता है, किस तरह से उसकी जिंदगी मौत से बदतर हो जाती है, मैंने कॉरल को देखकर जाना। लेकिन सच यह भी था कि कॉरल का देखकर ही पता चला कि उसी सुनसान बियाबान में प्रेम एक खुशबू की तरह वजूद को कैसेट महकाता रहता है। उस औरत के प्‍यार, इंतजार और तड़प को सलाम करती हूं मैं। मेरा विश्‍वास प्रेम पर है और इसीलिए मैं अपने ब्‍लॉग की शुरुआत इसी प्रेमकहानी के साथ कर रही हूं। मैं किसी न किसी तरह खुद को अपराधी महसूस करती हूं कि उसकी कोई मदद नहीं कर पाई, शायद कॉरल इसके लिए मुझे माफ कर दे। ये पोस्‍ट कॉरल को समर्पित हैं......&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;" src="http://3.bp.blogspot.com/_XL5MGzuI3Pw/SHbwkVI5T5I/AAAAAAAAABg/xzfJll_N2Bg/s200/Coral.bmp" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5221625324923080594" &gt; छह साल बाद मैं अपने शहर चंडीगढ़ में दोबारा लौटी हूं। कई दिनों से सोच रही थी कॉरल से मिलने के लिए। इन बरसों में इस शहर की यादों ने मेरे साथ सफर किया है। इनमें कॉरल की याद भी थी। अनायास मैं उसके घर की तरफ मुड़ चली। हालांकि उसके घर का नंबर याद नहीं था पर याद था वो घर जिस एनेक्‍सी में वो अकेली रहा करती थी। मैंने उसे अपने अखबार के लिए एक बार इंटरव्यू किया था। उसके बाद मैं अक्‍सर उससे मिलने जाने लगी थी। मैंने उसका मकान ढूंढ लिया। लेकिन यहां एक सदमा मेरा इंतजार कर रहा था। पता चला कि दो साल पहले ही उसकी मौत हो चुकी है। पड़ोस के लोगों से पूछा तो उन्‍होंने बताया-हां यहां एक ऑस्‍टरेलियन बूढ़ी औरत यहां रहती थी लेकिन उसे मरे दो साल हो गए। कॉरल इस दुनिया से वहां जा चुकी है जहां से कभी वापस नहीं आएगी। लेकिन उसकी आत्‍मा अगर कहीं से भी मुझे देख पा रही है तो मुझे माफ कर दे क्‍यों‍कि मैं उसकी आखिरी चाह पूरी नहीं कर सकी।&lt;br /&gt;उसके पास यादें थीं। बच्‍चों की, उसके देश की, मदर टेरेसा की....उस जिंदगी की भी जिसकी वास्‍तवकिता काफी नाटकीय रही। सबसे दूर, बहुत बीमार, और उम्र के उस पड़ाव पर जहां यादें तंग करती हैं और सपने जवाब दे जाते हैं। सेक्‍टर 11 में एक कोठी की एनेक्‍सी में पड़ी कॉरल शेफर्ड के पास एक ही इच्‍छा थी कि वो एक बार मरने से पहले ऑस्‍टरेलिया जा बसी अपनी बेटी कॉलिन को एक बार देख सके। उसे मालूम था कि यह इच्‍छा जल्‍दी से पूरी होने वाली नहीं है। ऐसे में मैं शायद फरिश्‍ता लगती थी। वह मुझसे बहुत सारी बातें करती थी, जीवन की हर जंग में हारी कॉरल टूटी-फूटी हिंदी बोला करती थी। उसे बहुत उम्‍मीदें थी शायद मुझसे। हमेशा मुस्‍कुराती और हंसती, लेकिन बीच में ही आंसुओं में डूबकर रोना शुरू कर देती। वह चाहती थी कि उसकी हालत की खबर उसकी बेटी तक पहुंच जाए। उसके पास एक अटेंडेंट थी जो चलने, फिरने से लाचार कॉरल का सहारा थी। उस दिन मेरे सामने ही फोटो खिंचवाने के लिए उस अटेंडेंट शारदा से मेकअप करवाया। उसके होंठ सुर्खी से रंगे थे और आंख आंसुओं से।&lt;br /&gt;एक जमाने में कॉरल हसीन थी, उसने प्‍यार किया था, और इस तरह किया था कि वह खुद को भी भूल गई। पागलपन की हद तक प्‍यार में डूब गई थी एक इस शहर में रहने वाले एक युवा होम सेक्रेटरी के। तब वह यहां किसी रिश्‍तेदार से मिलने आई थी। उस होम सेक्रेटरी से उसकी शादी नहीं हो सकी थी लेकिन वह यहीं की होकर रह गई थी। कॉरल ने बताया-हम यहां आंटी के पास आया था लेकिन होम सेक्रेटरी के लिए यहीं रह गया।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4600603968664327804-641338825791905650?l=summerhillss.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://summerhillss.blogspot.com/feeds/641338825791905650/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=4600603968664327804&amp;postID=641338825791905650' title='8 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4600603968664327804/posts/default/641338825791905650'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4600603968664327804/posts/default/641338825791905650'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://summerhillss.blogspot.com/2008/07/blog-post.html' title='मुझे माफ करना कॉरल.....'/><author><name>मनीषा भल्ला</name><uri>http://www.blogger.com/profile/08641339911733741450</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/_XL5MGzuI3Pw/SNVJx1535_I/AAAAAAAAAFM/auzHNlwYHi0/S220/m-2%5B1%5D.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://3.bp.blogspot.com/_XL5MGzuI3Pw/SHbwkVI5T5I/AAAAAAAAABg/xzfJll_N2Bg/s72-c/Coral.bmp' height='72' width='72'/><thr:total>8</thr:total></entry></feed>
