November 17, 2008

दिल्ली में दान


दिल्ली में दान..

लगभग एक महीने से ज्यादा होने को आया मुझे दिल्ली में। यहां की दौड़ती-भागती जिंदगी की अपने शहर चंडीगढ़ से तुलना करने के कोई न कोई मौका मिल जाता है। मयूर विहार समाचार अपार्टमेंट के पास की मार्केट में एक छोटा सा ढाबा है। बिना छत्त के। बहुत छोटी से साफ-सुथरी रेहड़ी पर रोज पांच सब्जियां बनाता है राजकुमार। साथ में तंदूर की कड़क रोटी की बजाए मुलायम और फूली हुई तवे की चपाती । इस इलाके में रहने वाले ज्यादातर लड़के-लड़कियां और वह लोग जिनके घर चूल्हा-चौंका नहीं है ,यहीं खाना खाते हैं। राजकुमार को मेरे आने का खासतौर पर इंतजार रहता है। चूंकि वह पंजाबी है। लुधियाना का रहने वाला। इसलिए पंजाबी में अपने घर और कारोबार के रोनेधोने मुझे सुनाकर काफी राहत सी महसूस करता है। फिर समय मिले तो लुधियाना की तंग गलियों,स्वेटर, बिजनेस और वहां के गोटा-किनारी की बातें भी कर लेता है। बातों-बातों में साग और मक्की की रोटी और अमृतसरी वड़ियों का स्वाद भी याद दिला देता है। साथ की साथ छोटू को जूठे बर्तनों पर तेज-तेज हाथ चलाने के लिए भी कहता है।

आज उसने मुझसे कहा कि 'मटर-पनीर खाओगे?' मैंने यह कहकर मना कर दिया कि मैं रात को हल्का खाना ही खाती हूं। मैंने उससे पूछा कि क्या बात है आज मटर-पनीर क्यों बनाया है? तो कहने लगा कि 'एक अपार्टमेंट में बड़े बाबू जी रहते हैं न अपने माता-पिता की याद में दान करवा रहे हैं। उन्होंने मुझे यह कहकर पैसे दे दिए कि लोगों को खाना खिला देना।' अब बेचारा राजकुमार परेशान है दान के इस तरीके से कि किसे खाना खिलाए किसी न खिलाए।

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